hindi shayari for love/हिंदी शायरी प्यार के लिए,

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जुल्फ़ बन कर बिखर गया मौसम,
धूप को छांव कर गया मौसम...

मैंने पूछी थी खैरियत तेरी,
मुस्करा कर गुज़र गया मौसम...

फिर वो चेहरा नज़र नहीं आया,
फिर नज़र से उतर गया मौसम...

तितलियाँ बन के उड़ गयीं रातें,
नींद को ख़्वाब कर गया मौसम...

तुम न थे तो मुझे पता न चला,
किधर आया किधर गया मौसम...

दिल बुरी तरह से धड़कता रहा,
वो बराबर मुझे ही तकता रहा...

रोशनी सारी रात कम ना हुई,
तारा पलकों पे इक चमकता रहा...

छू गया जब कभी ख़्याल तेरा,
दिल मेरा देर तक धड़कता रहा...

कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया घर में,
और घर देर तक महकता रहा...

उसके दिल में तो कोई मैल न था,
मैं ख़ुदा जाने क्यूँ झिझकता रहा...

मीर को पढ़ते पढ़ते सोया था,
रात भर नींद में सिसकता रहा...


बेवफा होगा, बावफा होगा,
उससे मिल कर तो देख क्या होगा

बैर मत पालिए चरागों से
दिल अगर बुझ गया तो क्या होगा

सर झुका कर जो बात करता है
तुमसे वो आदमी बड़ा होगा

क़हक़हे जो लुटा रहा था कभी
वो कहीं छुप के रो रहा होगा

उससे मिलना कहाँ मुक़द्दर है
और जी भी लिए तो क्या होगा

राहत एक शब में हो गए हैं रईस
कुछ फक़ीरों से मिल गया होगा


ज़िन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे
अब भी बाक़ी हैं कई दोस्त पुराने मेरे

आपसे रोज़ मुलाक़ात की उम्मीद नहीं
अब कहाँ शहर में रहते हैं ठिकाने मेरे

उम्र के राम ने साँसों का धनुष तोड़ दिया
मुझ पे एहसान किया आज ख़ुदा ने मेरे

आज जब सो के उठा हूँ तो ये महसूस हुआ
सिसकियाँ भरता रहा कोई सिरहाने मेरे



धूप बहुत है मौसम जल थल भेजो ना
बाबा! मेरे नाम का बादल भेजो ना

मौलसिरी की शाखों पर भी दिए जलें
शाखों का केसरिया आँचल भेजो ना

नन्ही-मुन्नी सब चहकारें कहाँ गई
मोरों के पैरों की पायल भेजो ना

बस्ती-बस्ती दहशत किसने बो दी है
गलियों-बाजारों की हलचल भेजो ना

सारे मौसम एक उमस के आदी हैं
छाँव की ख़ुशबू, धूप का सन्दल भेजो ना

मैं बस्ती में आख़िर किस से बात करूँ
मेरे जैसा कोई पागल भेजो ना


 सिर्फ़ सच और  झूठ की मीज़ान में रक्खे रहे
हम बहादुर थे मगर मैदान में रक्खे रहे

जुगनुओं ने फिर अँधेरों से लड़ाई जीत ली
चाँद -सूरज घर के रौशनदान में रक्खे रहे

धीरे-धीरे सारी किरणें ख़ुदकुशी करने लगीं
हम सहीफ़ा थे मगर जुज़दान में रक्खे रहे

बन्द कमरे खोलकर सच्चाइयाँ रहने लगीं
ख़्वाब कच्ची धूप थे, दालान में रक्खे रहे

सिर्फ इतना फ़ासला है ज़िन्दगी से मौत का
शाख़ से तोड़े गए गुलदान में रक्खे रहे

ज़िन्दगी भर अपनी गूंगी धड़कनों के साथ-साथ
हम भी घर के कीमती सामान में रक्खे रहे