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“इक जाम-ए-जुनूं को लबों से लगाया है,

दिल को इक नये ग़म का नशा कराया है,

ये कैसी हलचल मची है, महफ़िल में

क्या कोई चाक जिगर महफ़िल में आया है”

“शायरी इक शरारत भरी शाम है,

हर सुख़न इक छलकता हुआ जाम है,

जब ये प्याले ग़ज़ल के पिए तो लगा ,

मयक़दा तो बिना बात बदनाम है”

“क्या नशा है इश्क आज तक समझ ना पाये हम,

उन नशीली आँखों में कहीं हो ना जाऐं गुम,

युँ तो इश्क समझ नहीं आता ना जाने क्या बला थी ये,

कि जुदा होने पे उनकी ये आँखे हो गई”

“एक हम है की खुद नशे में है,

एक तुम हो की खुद नशा तुम में है।”

“कुछ  नशा तो  आपकी बात  का है,

कुछ नशा  तो धीमी बरसात का  है,हमें आप यूँ ही शराबी  ना कहिये,

इस दिल पर असर तो आप से मुलाकात का है”

“तुम क्या जानो शराब कैसे पिलाई जाती है,

खोलने से पहले बोतल हिलाई जाती है,

फिर आवाज़ लगायी जाती है ,

आ जाओ दर्दे दिलवालों,

यहाँ दर्द-ऐ-दिल की दावा पिलाई जाती है”

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