”लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में; किसकी बनी है आलम-ए-ना पैदार में; कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें; इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में।”

”निकले हम कहाँ से और किधर निकले; हर मोड़ पे चौंकाए ऐसा अपना सफ़र निकले; तूने समझाया क्या रो-रो के अपनी बात; तेरे हमदर्द भी लेकिन बड़े बे-असर निकले।”

”उन गलियों से जब गुज़रे तो मंज़र अजीब था; दर्द था मगर वो दिल के करीब था; जिसे हम ढूँढ़ते थे अपनी हाथों की लकीरों में; वो किसी दूसरे की किस्मत किसी और का नसीब था।”

”दिल की हालात बताई नहीं जाती; हमसे उनकी चाहत छुपाई नहीं जाती; बस एक याद बची है उनके चले जाने के बाद; हमसे तो वो याद भी दिल से निकाली नहीं जाती।”

”जब रूह किसी बोझ से थक जाती है; एहसास की लौ और भी बढ़ जाती है; मैं बढ़ता हूँ ज़िन्दगी की तरफ लेकिन; ज़ंजीर सी पाँव में छनक जाती है।”

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