खामोश फ़िज़ा थी कोई साया न था इस शहर में मुझसा कोई आया न था ।

किसी ज़ुल्म ने छीन ली हम से हमारी मोहब्बत हमने तो किसी का दिल दुखाया न था॥

 

अगर मैं लिखूं तो पूरी किताब लिख दूँ तेरे दिए हर दर्द का हिसाब लिख दूँ।

डरती हूँ कहीं तू बदनाम ना हो जाए वरना तेरे हर दर्द की कहानी मेरा हर ख्वाब लिख दूँ॥

 

काश उनको पता होता मेरे दर्दे दिल की चुभन तो वो हमको बार-बार न सताया करते।

जिस बात से हम उनसे रोज खफा होते हैं तो वो बात हमसे न बताया करते ये बात भी ऐसी है।

जोकि कोई बात नहीं किसी गैर का नाम लेकर हमको न तड़पाया करतेl॥

 

टूटे हुए सपने को सजाना आता है रूठे हुए दिल को मनाना आता है ।

उसे कह दो हमारे जख्म की फ़िक्र न करे हमें दर्द में भी मुस्कुराना आता है॥

 

जब किसी का दर्द हद से गुजर जाता है तो समंदर का पानी आँखों में उतर आता है।

कोई बना लेता है रेत से आशियाना तो किसी का लहरों में सब कुछ बिखर जाता है॥

 

मिले न फूल तो काँटों से जख्म खाना है उसी गली में मुझे बार-बार जाना है।

मैं अपने खून का इल्जाम दूँ तो किसको दूँ लिहाज ये है कि क़ातिल से दोस्ताना है॥

 

लोग तो अपना बना कर छोड़ देते हैं कितनी आसानी से गैरों से रिश्ता जोड़ लेते हैं।

हम एक फूल तक ना तोड़ सके कभी कुछ लोग बेरहमी से दिल तोड़ देते हैं।।

 

दर्द से हाथ न मिलाते तो और क्या करते गम के आँसू न बहाते तो और क्या करते ।

उसने माँगी थी हमसे रौशनी की दुआ हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते॥

 

ये क्या है जो आँखों से रिसता है कुछ है भीतर जो यूं ही दुखता है कह सकता हूँ ।

पर कहता भी नहीं कुछ है घायल जो यहाँ सिसकता है॥

 

अपनी तो जिंदगी की अजब कहानी है जिसे हमने चाहा वही हमसे बेगानी है ।

हँसता हूँ दोस्तों को हँसाने के लिए वरना इन आँखों में पानी ही पानी है।।

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