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“मोहब्बत में किसी का इंतजार मत करना; हो सके तो किसी से प्यार मत करना; कुछ नहीं मिलता मोहब्बत कर के; खुद की ज़िन्दगी बेकार मत करना।”

“रोते रहे तुम भी, रोते रहे हम भी; कहते रहे तुम भी और कहते रहे हम भी; ना जाने इस ज़माने को हमारे इश्क़ से क्या नाराज़गी थी; बस समझाते रहे तुम भी और समझाते रहे हम भी।”

”वो नाराज़ हैं हमसे कि हम कुछ लिखते नहीं; कहाँ से लाएं लफ्ज़ जब हमको मिलते नहीं; दर्द की ज़ुबान होती तो बता देते शायद; वो ज़ख्म कैसे दिखाए जो दिखते नहीं।”

”साँस थम जाती है पर जान नहीं जाती; दर्द होता है पर आवाज़ नहीं आती; अजीब लोग हैं इस ज़माने में ऐ दोस्त; कोई भूल नहीं पाता और किसी को याद नहीं आती।

दर्द दे गए सितम भी दे गए; ज़ख़्म के साथ वो मरहम भी दे गए; दो लफ़्ज़ों से कर गए अपना मन हल्का; और हमें कभी ना रोने की कसम दे गए।”

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